Sunday, 1 April 2018

धन्वा मरी नहीं थी






धन्वा मरी नहीं थी 
मर गये थे उसके हिस्से के सुख
मर गये थे उसके हिस्से के रिश्ते

जिंदा थी दो आँखें
जिंदा था पेट
जिंदा नहीं था जिह्वा का स्वाद

जिंदा थी दो टांगे, जिसपर खड़ी रहती बारहो मास
दोॆनों हाथों को उठाये
बालों को खुजाते अचानक बोल पड़ती कभी
ये राजो सुन! एक दिन तो सबको मरना है।
कहाँ जाती है. चल! रोटी तो खिला

सास ने कहा कोई बीमारी है
मां ने कहा कोई जादू-टोना


झाड़-फूंक, डागदर-वागदर नहीं आया काम
धन्वा कोई श्रृषि हो गई थी


फिर भी सब मंगल है...

जब धरती बस धरती थी
जब अंबर बस अंबर था

सूरज था एक अनबुझी पहेली
खौफ भरी कायनात थी
रात बस  न रात थी

जंगल में जीव थे
जंगल में जीवन था


शब्दों के फुटने से पहले
स्पर्श का वितान था
आँखों की पुतलियों में विस्मय का संसार था

खोने को कुछ नहीं था
पाने का  भी नहीं पता
सुख-दुख नहीं थी बला


झरने सी जिंदगी  चलती थी डगर डगर
पाप-पुण्य अगर-मगर
इसकी नहीं थी खबर


असँख्य वर्ष बीत गए
सुख -दुख के संसार में
होड़ ही होड़ है।
जिसका नहीं छोर है

धर्म है अर्धम है।
राजनीति गर्म है।

आखेटक की मौज है
शहर नया जंगल है।

रोज यहाँ दंगल है।

हाँ !रोज यहाँ दंगल है
फिर भी सब मंगल है।
                                                                       (c) #महिमाश्री






















कविता

1

धुआं भर जाये शिराओं में तो मुश्किल होता है उन्हें निवालों के साथ जज्ब करना

हर वक्त कोई पैनी निगाह हर क्षण नाप रहा हो  अगला कदम 

सिमटना  खुद को संकुचित  करना नहीं होता
दूसरों के लिए जगह छोड़ना भी होता है।

सिरहाने रखी हर किताब में वो बात नहीं होती
कि उसे अंत तक पढा जाये

कई बार सफे पलट लेने भर से कहानी का अंत समझ में आ जाता है।


2.

चलने भर तक  चला  नहीं गया
बुनने बैठी बुना गया

वो चल कर आया मुझतक मुझसे दरवाजा खोला नहीं गया



3.
 हमारी माँओं  से चुप रहने को कहा गया
 हम  बदलें में चीख रहे हैं।

 जरुरत है कि सीख लें कब और कहाँ चीखना है।
----महिमाश्री






Friday, 16 February 2018

फरवरी के नाम...



फरवरी के नाम..
ओ वसंत! तुम्हारे स्वागत में सिर्फ प्रेम लिखना चाहती हूँ
तुम्हारी आहट से पहले और अंतिम पदचाप तक
सिर्फ प्रेम ...
अपने अन्तरराग को मधुर स्मृतियों में डूबों कर
अगले वसंतोत्सव के लिए भर लेना चाहती हूँ प्रेम का प्याला
ताकि लड़ संकू हर उस विष से जो अनजाने ही घर कर बैठा है रोम रोम में
अवांक्षित अवशिष्ट को परे कर
ओ वंसत ! तुम्हें जी भर जीना चाहती हूँ..

#महिमाश्री

Monday, 22 January 2018

नई ग़ज़ल-मर रही संवेदना हर गाम है।

आदमी यूँ हो रहा बदनाम है।
मर रही संवेदना हर गाम है।

भूख से क्यों मर गई संतोषी हाँ !
क्या यही जम्हूरियत का नाम है।

रुक नहीं पाई करों की चोरियाँ
नोटबंदी तो हुई नाकाम है

खाफ़ से डरता नहीं है इश्क अब
फेसबुक पे यूँ ही चर्चा आम है।

चैन से क्यों सो रहा है बावला
बेटियों के बाप पे इल्जाम है।

ढल गई है जिंदगी की शाम अब
इसके आगे बस खुदा का नाम है।

रात भर सोया नहीं ये सोच कर
सोचना ही क्या मेरा बस काम है।

@महिमा श्री दिसम्बर 2017

Sunday, 10 December 2017

हसीनाबाद- गीताश्री

"हसीनाबाद" चर्चित कथाकार व पत्रकार गीताश्री का पहला उपन्यास है।  उपन्यास के नाम से ही स्पष्ट है कि नायिका प्रधान है। इस उपन्यास में खास बात है  वज्जिका संस्कृति और उस लोक की आत्मा , उसकी मिट्टी की सुगंध , जो अंत तक बांधे रहती है।  इसमें तीन औरते है, सुंदरी देवी, गोलमी कुमारी, और रज्जो। तीनों के माध्यम से लेखिका ने समय काल की स्त्रियों के संघर्ष को दिखाया  है।  सुंदरी देवी सामंती सत्ता में दबी कुचली वह स्त्री है जो हर सुबह अपने होने को तलाशती है।  जिसकी जिंदगी में हर रिश्ता अवैध है।जिसकी हर सांँस ठाकूर के रहमो करम पर अटकी है। जिसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता है। मगर  अपने भय पर विजय पा कर अपनी बच्ची के भविष्य के लिए अनजान व्यक्ति के साथ अनजान सफ़र पर निकल पड़ती है।

गोलमी को अपना भूत नहीं पता है मगर उसे क्या करना है , कहाँ जाना है, क्या पाना है उसकी आँखों में स्पष्ट है। उसे अपना लक्ष्य पता है और उसके लिए प्रतिबद्ध है।हृदय से भोली, निष्कलंक गोलमी का हृदय विशाल है और पृितसत्ता के हर चंगुल से आजाद सबको साथ लेकर आगे बढ़ती है और इस समाज से वो सम्मान और प्यार हासिल करती है जो हर स्त्री का हक है। इस तरह वह सुंदरी देवी के संघर्ष को भी मान दिलवाती है।

रज्जो का भी यहाँ जिक्र करना बहुत जरुरी है। नायिका  की चारित्रिक उँचाइयों के चित्रण के लिए ऐसे पात्र ही सहायक होते हैं। रज्जो  वो मतलबी व महत्वकांक्षी स्त्री है जो अपने   सपने पूरे करने के लिए अपनी दोस्त, अपने लोग, अपनी मिटटी को भी इस्तेमाल करने से नहीं हिचकती।

गीता श्री  स्त्री विमर्श के लिए जानी जाती है। आप पर बोल्ड लेखन का यदा- कदा आक्षेप लगा है। मगर इस उपन्यास में ऐसा कुछ भी नहीं खोज पायेगें । बेहद सहज -संतुलित लेखन, कथा में प्रवाह इतना कि आप एक ही बैठकी में पढ़ जाएेंगे।

कहने को बहुत कुछ कहा जा सकता है। हसीनाबाद का दर्द है, लोक गीत की बहार है  ,राजनीति की दौड़ है , थोड़ी इतिहास की छौंक भी। प्रेम-दोस्ती, त्याग और धोखा भी ।

कई संवाद ऐसे है जो पढ़ते ही जुबान पर चढ़ जाते हैं।

जैसे "गोलमी सपने देखती नहीं बुनती है।"
बरहाल गीताश्री जी  को पहले उपन्यास के लिए बहुत बधाई।

Saturday, 9 December 2017

कविता 2017 दिसम्बर

1
ख्वाहिशे हजार वाट की आँखों में जलती हैं ।
जैसे गंगा में जलते हैं असंख्य दीये
गंगा आरती के आलाप के साथ ख्वाहिशे मन्नतों में बदलने लगती हैं।
मन्नतें फांसी बन जाती है.. बुधिया खेती करते कर्ज में डूब जाता है।

बाबुल मोहे काहे को ब्याहे विदेश..
ख्वाहिशों के दीये कुछ किनारे , कुछ बीच धार डूब जाते हैं
मुनिया की हसरतें छ्प्पर पर रख दी गई है।
बरसात एक दिन बहा देगी
कुछ चुल्हें की आग में झोंक देगी खुद ही.

कहीं टूटा है तारा
कई लह बुदबुदाते हैं अनायास
ख्वाहिशे फिर कहीं जागी है हौले हौले
अबकि बारिश हरी कर गई है हसरतें
बो गई है कई सपने
जगा गई हैं फिर उमंगे


2
वक्त की आँखों पर चढ़ा सदियों का सामंती धुंध
हर बार स्त्रीत्व को पऱखने के नये पौमाने गढे़

आत्मा पर चढ़े भय के कोहरे में कैद
एक ही धुरी पर घूमती रही स्त्री 

कोहरे को चीर नए रास्ते बनाने के जतन में
लहुलूहान करती रही सीना

जीवन के चाक पर अनजाने ही पीसती गई सपनो के बिरवे
कुचलती रही उँगलिया

एक दिन कहानी का पटाक्षेप होगा
बाऱिश की बुंदाबादी के बाद
आसमान के माथे पर लहकेगा सुनहरा सूरज

धरती के गर्भनाल से क्षितिज के सीने तक
समानता का सतरंगी इन्द्रधनुष चमकेगा
हरियायेगी धरती, टहकेगा बिरवा, फलेगा प्रेम
                                     महिमाश्री